शराब कोई आनंद या अभिशाप
"शराब"ये शब्द भी कितना अजीब है ना, शर+आब ये शर से आब ही छीन लेता है। आखिर इसमें ऐसा होता क्या है जो ये किसी की हस्ती खेलती जिंदगी में आग लगा देती है।ये किसी के सर का ताज छीन लेती है। किसी बेटी की लाज छीन लेती है किसी मां के घर का सुहाग छीन लेती है।आखिर कर क्या देती है ये उस इंसान को जो इसे पी कर अपनी इन्सानियत ही भूल जाता है।वो अपने पराये का फर्क ही भूल जाता है भूल जाता है वो अपनी जान से ज्यादा प्यार करने वाली पत्नी को। भूल जाता है वो उन बच्चो को जिनको वो अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता है उन पर क्या बित रही होगी। जिन बच्चो की आँख में आसु तो क्या जब कभी कोई कचरा भी चला जाये तो वो भी रोये बिना नहीं रहता था। कहा चला जाता है वो पिता जो अपने बच्चो की हर ख्वाइस पूरी किये किया करता था।
इस शराब ने हमारे समाज को दिया क्या है हर दिन घर में होने वाले झगते जिनका कोई अंत नहीं और यदि अंत हुआ भी तो कहा किसी कोर्ट में जिसका कभी कोई फैसला आया ही नहीं।
इस शराब ने उनका सब कुछ छीन लिया।
मै आप लोगो से पूछना चाहुगा क्या ये सही है हमारे और हमारे समाज के लिए क्या सरकार इसे कभी ख़त्म कर पाएगी जहाँ ये सरकार के ख़जाने का 1/5 भाग भर्ती हो।

Abhishrap
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